BA 1st Year Hindi, B.A First Year Notes in Hindi

 D.D.U GORAKHPUR UNIVERSITY AND SIDDHARTH UNIVERSITY NOTES
BA 1st Year Hindi, B.A First Year Notes in Hindi

बीए प्रथम वर्ष हिंदी, B.A फर्स्ट ईयर प्रश्न पत्र नोट्स इन हिंदी

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ध्रुवस्वामिनी


प्रश्न- ध्रुवस्वामिनी रंगमंच की दृष्टि से एक सफल कृति है प्रस्तुत कथन के आधार पर मूल्यांकन कीजिए?

(2005,07,09,16)

रंगमंचीयता की दृष्टि से ध्रुवस्वामिनी नाटक की समीक्षा

(DDU 2016, 2018, 2019, 2020) अथवा

"प्रसाद की स्वच्छन्दतावादी नाट्य-धर्मिता जितना ध्रुवस्वामिनों में संघत है और कहीं नहीं - को दृष्टि में रखते हुए नाटक पर विचार कीजिए। (2016) (SU 2018)

उत्तर-भूमिका-भारतीय प्राचीन विद्वानों ने नाटक को दृश्याव्य के अन्तर्गत रखा है। उनका मत था कि नाटक रंगमंच के अनुरूप होना चाहिए। इसोलिए प्राचीन समय में जो भी नाटक लिखे गये वे प्रायः रंगमंच की दृष्टि से सफल थे। विशाख, भाम, अश्वघोष, कालिदास आदि की नाट्य कृतियाँ इसके प्रमाण है. लेकिन आधुनिक समय में जब छपाई कला के विकास के साथ ही पढ़े जाने वाले नाटकों का दौर चला तो नाटककारों ने नाटकों की अभिनेता को तिलांजलि दे दी। विचार करने की बात यह है कि यदि नाटक को पाठ्य विधा मान लिया। जाय तो भारतीय रंगमंच को स्थिति अत्यन्त दयनीय हो जायेगी।

रंगमंच के सम्बन्ध में विद्वानों की मान्यताएं- इस सम्बन्ध में रामकुमार वर्मा का मत है कि किसी भी भाँति नाटक को उत्कृष्टता का प्रश्न और निर्णय बिना मंच के सम्पर्क के बिना नहीं हो सकता। यदि नाटक प्राप्त है तो मंच उसका शरीर है। पाश्चात्य विद्वान इमर राइट का कथन भी रामकुमार वर्मा के कथन के समीप नाटक का मूल सार शब्द नहीं किया-कलाप है। नाटक खेलने के लिए ही लिखे जाते हैं।" इस विषय पर जयशंकर प्रसाद जी ने भी अपना मत दिया है उनका कथन है कि 'नाटक को रंगमंच के बन्धन से मुक्त होना चाहिए। क्योंकि नाटक के लिए रंग मंच होता है न कि रंगमंच के लिए नाटक में अभिनेयता के लिए आवश्यक गुण-नाटक में अभिनेयता के लिए विद्वानों ने कुछ गुणों को होना आवश्यक माना है। जो निम्नलिखित है

1. नाटकीयस्तु सरम एवं सुबोध होनी चाहिए। 
2. कथावस्तु में असम्भव एवं अरुचिकर घटनाओं को नहीं होना चाहिए।
3. नाटक में कम पात्र होने चाहिए।
4. संवाद रोचक सरल एवं प्रवाह पूर्ण होना चाहिए।
5. नाटक का समावेश होना चाहिए। नाटक की भाषा सरल, सुबोध प्रवाहपूर्ण एवं पात्रों के अनुकूल होनी चाहिए।
7. नाटक में दार्शनिकता का अभाव होना चाहिए। ध्रुवस्वामिनी में अभिनेता-उपर्युक्त गुणों के आधार पर जब हम 'धुवस्वामिनी' नाटक का मूल्यांकन करते हैं, तो यह निश्चित हो जाता है कि प्रसाद कृत 'ध्रुवस्वामिनी' नाटक अभिनेयता और रंगमंच की दृष्टि से पूर्ण सफल है. 
कथानक में अभिनेता प्रसाद जी ने जितने भी नाटकों की रचना की है उन सभी में अभिनेता की दृष्टि से 'धूस्वामिनी' सबसे सफल है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इस नाटक का कथानक अत्यन्त संक्षिप्त सुगठित एवं गति युक्त है। इस नाटक में घटनाओं की अधिकता नहीं है। मुख्य रूप से शकराज का सन्धि प्रस्ताव सन्धि प्रस्ताव पर चन्द्रगुप्त द्वारा क्रोधित होकर स्त्रीवेश में शकराज के पास धुवस्वामिनी के साथ जाना, उसका वध और उसके दुर्ग पर अधिकार, विजय के समाचार को सुनकर रामगुप्त का वहाँ जाना तथा ध्रुवस्वामिनी का मोक्ष प्राप्त करना और सामन्त कुमार द्वारा रामगुप्त का वध, इत्यादि ऐसी घटनाएं हैं जिन्हें कम पात्रों के द्वारा रंगमंच पर सरलता पूर्वक अभिनीत किया जा सकता है।


प्रसाद जी ने प्रत्येक अंक के प्रारम्भ में ही रंगमंच के लिए आवश्यक निर्देश भी दिये हैं जो रंगमंच के निर्माण में सहायक है। उदाहरण के लिए प्रथम अंक का दृश्य है- "शिविर का पिछला भाग, जिसके पीछे पर्वतमाला का प्राचीर है, शिविर का एक कोना दिखायी दे रहा है, जिससे सटा हुआ चन्द्रात टंगा है। मोदी-मोटी रेशमी डोरियों से सुनहले काम के परदे स्तम्भों से बंध है। दो तीन सुन्दर मंच रखे हुए हैं। चन्द्रातप और पहाड़ी के बीच छोटा-सा कुंज, पहाड़ी पर से एक पतली जलधारा उस हरियालो रंगमंच के निर्देश के कारण इन दृश्यों का निर्माण सरलता पूर्वक

संवादों एवं घटनाओं में नाटकीयता विवेच्य नाटक की घटनाएँ न तो अस्वाभाविक हैं और न ही अरुचिकर है। इस नाटक के संवाद सजीव, सरल, प्रवाहपूर्ण है। इस नाटक के संवाद पात्रों के अनुकूल हैं। इसमें नाटकीयता है, जिससे नाटककार दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हुआ है। एक उदाहरण दष्टव्य है (ध्रुवस्वामिनी क्रोध से) "संसार मिथ्या है या नहीं, यह तो मैं नहीं जानती, परन्तु आपका कर्मकाण्ड और आप के शास्त्र क्या सत्य है-जो सदैव रक्षणीया स्त्री को यह दुर्दशा हो रही है।"

हास्य और व्यंग्य हास्य और व्यंग्य के अभाव में नाटक में नीरसता आ जाती है। नाटक निर्जीव हो जाया करता है। नाटक में हास्य-व्यंग्य का होना नितान्त आवश्यक हुआ करता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए नाटककार प्रसाद जी ने इस नाटक में हास्य और व्यय का समावेश किया है। उदाहरण के लिए स्वामिनी का निम्नलिखित कथन देखने लायक है- "उसे छोड़ दो कुमार। यहाँ पर एक वहाँ नपुंसक तो नहीं। बहुत से लोगों में किस-किस को निकालोगे। सुमुधर गीतों का समावेश-सहृदय के मनोरंजन के लिए नाटकों में गीतों का समायोजन किया जाता है। नाटक में गीतों को बहुलता नहीं होनी चाहिए । ध्रुवस्वामिनी में चार गीत हैं। जो आकर्षक, सरस, स्वाभाविक हैं। इस नाटक के गीत अवसर के अनुकूल हैं। प्रसाद जी इस नाटक में गीतों का समावेश करके सौन्दर्य और लोकानुरञ्जन की वृद्धि की है।

कायिक, वाचिक, एवं सात्विक अभिनयों का गुम्फन ध्रुवस्वामिनी अभिनय की दृष्टि से एक सफल नाट्य कृति है। इसमें अभिनय की विविधता है। इसमें अभिनय के विविध प्रकारों का समायोजन किया गया है। इसमें वाणी के द्वारा कथ्य को प्रभाव पूर्ण बनाने का प्रयास किया गया है। सात्विक अभिनयों के द्वारा दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया गया है। इन अभिनयों के कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं-हिजड़े का कुबड़े की पीठ पर बैठना, बौने द्वारा मोद्दल को तलवार की भांति घुमाना, हँसकर, बातकाट कर, क्रोध से आश्चर्य से, इत्यादि।

संकलन त्रय का पूर्ण निर्वहन-'ध्रुवस्वामिनी' में एक ही मूलकथा है। कथावस्तु व्यवस्थित है। इस नाटक में पात्रों की अधिकता नहीं है। पूरा नाटक तीन अंकों में विभाजित है। प्रत्येक अंक में केवल एक ही दृश्य है जो अपने आप में पूर्ण एवं धारावाहिक है। ध्रुवस्वामिनी नाटक का सम्पूर्ण कथानक अंकों के अनुकूल तीन खण्डों में विभक्त है और प्रत्येक अंक व दृश्य की घटनायें तथा कार्य व्यापार एक स्थान के होने के कारण संकलनत्रय का पूर्ण निर्वहन हुआ है।

इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन एवं विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि 'ध्रुवस्वामिनी' प्रसाद जी की एक नाट्य कृति है। इस नाटक में नाटकीय तत्वों का पूर्ण विकास हुआ है यही प्रसाद जी की नाट्यकला का परिचायक है। अतः हम कह सकते हैं कि 'ध्रुवस्वामिनी' नाटक रंगमंच एवं अभिनय की दृष्टि से एक सफल कृति है।

निबन्ध
साहित्य के दृष्टिकोण


प्रश्न 1. निबन्ध से आपका क्या आशय है ? इसके विभिन्न प्रकार का संक्षेप में परिचय दीजिए । हिन्दी निबन्ध शैली की विविधता पर प्रकाश डालिए।


उत्तर- निबन्ध का अर्थ-निबन्ध अंग्रेजी के 'एसे' के लिए प्रयोग किया जाता है। 'एसे' का अर्थ है- प्रयत्न या प्रयास, कहने का तात्पर्य यह है कि विचारों व भावनाओं की अभिव्यक्ति का प्रयास ही "निबन्ध' है। इस विषय पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मत है कि-'निबन्ध उसी को कहना चाहिए जिसमें व्यक्तित्व अर्थात् व्यक्तिगत विशेषता हो।" निबन्ध शब्द लेख और प्रबन्ध का पयार्य है।

निबन्ध शब्द पूर्ण रूप से स्वदेशी है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है। 'नि+बन्ध' जिसका अर्थ होता है एकत्रीकरण अथवा बाँधना। 'अमरकोश' में भली प्रकार बँधी हुई रचना को निबन्ध कहा गया है। वास्तव में निबन्ध अपने वास्तविक अर्थ के विपरीत एक बन्धहीन विधा है।

प्रो0 जयनाथ नलिन ने निबन्ध पर विचार करते हुए लिखा है कि-'निबन्ध स्वाधीन चिन्तन और निश्छल अनुभूतियों का सरस, सजीव और मर्यादित गद्यात्मक प्रकाशन है।' डॉ० मातादीन शर्मा का मत है-'निबन्ध मानव अनुभूतियों का नीड़ है, जिसमें मानसिक विचारों और भावों को व्यक्त करने वाले विहंग कूकते हैं। वाक्यों की वह श्रृंखला, सुसंगठित रचना निबन्ध है जिसमें लेखक का व्यक्तित्व जल के अन्तस्थल में रविरश्मियों के बिम्ब सा चमकता क्षण में प्रत्यक्ष और परोक्ष होता है-स्पष्टता सरलता, और भाव से युक्त हो।"

निबन्ध किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है और अपने अभीष्ट विषय के सम्बन्ध में विचार व्यक्त करने की लेखक को पूरी स्वतन्त्रता रहती है। जैसा कि विलियम हेजलिट ने लिखा है कि "निबन्धकार का काम यह दिखाना नहीं है जो कभी हुआ नहीं, न ही उसका प्रस्तुतीकरण करना, जिसका हमने सपना भी नहीं देखा, बल्कि वह दिखाना है जो रोज हमारी आंखों के सामने से गुजरता है, और जिसके बारे में हम ख्याल भी नहीं करते क्योंकि हमारे पास यह अर्न्तज्ञान नहीं होता या बुद्धि की वह पकड़ नहीं होती जो उन्हें सम्भाल सके।"




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