The question of reform of the judiciary

 न्यायपालिका में सुधार का सवाल

'अपनी जवाबदेही तय करे न्यायपालिका' शीर्षक से लिखे अपने आलेख में हृदयनारायण दीक्षित ने सही लिखा है कि कार्यपालिका और विधायिका की जवाबदेही तय है, लेकिन न्यायपालिका किसी निकाय या संस्था के प्रति जवाबदेह नहीं है। हालांकि निचली अदालतों को संबंधित राज्यों के हाई कोर्ट के प्रति जवाबदेह बनाया गया है,


लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। निचली अदालतों से प्रतिवर्ष दो दर्जन से अधिक जज निर्णयों की समीक्षा के नाम पर हाई कोर्ट द्वारा घर बिठा दिए जाते हैं। आज सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह बेहतर अवसर है कि वह खुद को और हाई कोर्ट की कार्यविधि को संवैधानिक जवाबदेही की सीमा में बांध सकता है। अगर हाई कोर्ट के जज गलत या अनधिकृत निर्णयन के दोषी होते हैं तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट केवल चेतावनी देने या ट्रांसफर से आगे कुछ नहीं कर पाता है, क्योंकि उन्हें हटाने के लिए केवल महाभियोग का प्रविधान है, जो आज तक किसी जज के विरुद्ध अमल में नहीं लाया जा सका। वहीं अदालतें सही और एक निश्चित समय सीमा में केसों का निपटारा करें इसके लिए भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। अगर फैसले की गुणवत्ता और भ्रष्टाचार की समस्या को छोड़ भी दें तो अभी विभिन्न अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं। कई मामलों में अंतिम फैसला आने में 30 से 40 साल का समय लग रहा है। न्यायपालिका की यह एक ऐसी समस्या है, जिसका खामियाजा लोकतंत्र के दूसरे अंग भी भुगत रहे हैं। इसने हमारी प्रगति को एक तरह से जकड़ रखा है। चूंकि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक-दूसरे से स्वतंत्र होते हुए भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अतः एक में खामी का असर दूसरे में भी नजर आने लगता है। विधायिका और कार्यपालिका में सुधार के निरंतर प्रयास होते रहे हैं। हालांकि ये अभी नाकाफी साबित हो रहे हैं, लेकिन न्यायपालिका में इसकी शुरुआत होना बाकी है। जाहिर है जब तक तीनों में एक साथ बड़े पैमाने पर सुधार की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जाएगी, तब तक देश समस्याओं की जकड़न से नहीं निकल पाएगा।

विवेक श्रीवास्तव, पटना

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